MIBL RADIO
Tanin MIBL Tanin
होम

ख़ून की क़सम — Mohsen Moussawi

ख़ून की क़सम

गीत

ख़ून की क़सम

Mohsen Moussawi

ख़ून की क़सम एल्बम से

MIBL Radio पर Mohsen Moussawi का “ख़ून की क़सम” सुनिए — मुफ़्त, बिना ऐप, तुरंत चालू।

बोल

फिर से गलियों की मिट्टी अर्ग़वानी रंग की हो गई

मेरे लोगों के दस्तरख़्वान का हिस्सा, पानी और रोटी की हसरत बन गया

अपने दीन और अपने अक़ीदे के नाम पर, तूने कितना ख़ून बहाया

अपनी सत्ता के तख़्त के पाए तले, तूने कितने बदन लटकाए

थकी हुई जनता पर बंदूक ताने खड़ा है, वह तू ही है

देख! कल के रास्ते तेरे खोखले घमंड ने बंद कर दिए

मेरा वह जवान, जिससे उम्मीद छीन ली गई, ज़िंदा होने के जुर्म में मारा गया

फ़ैसले सुनाने वाला तू ही है... बता! तेरा ज़मीर कौन ले गया?!

माँओं की आह से डर — वह तूफ़ान उठा रही है

इन लोगों के रुके हुए रुदन से डर — वह तुझे यहीं हिला देगा

इस सारी सियाही से शर्म कर, इन गंदे हाथों से शर्म कर

उस लाला के ख़ून की क़सम — वह कभी... कभी बेकार नहीं गया!

आईने में देख: क्या तू अपना ही चेहरा पहचानता है?

या सत्ता के मुखौटे के पीछे, कल के लिए बहाना ढूँढ़ रहा है?

आज अपनी जगह बनाए रखने को तूने साँसें काट दीं

मगर ऐ कल से बेख़बर... क्या तूने हमारी आवाज़ नहीं सुनी?!

मेरी ख़ामोशी अब टूट चुकी — आज मैं चीख़ का पहाड़ हूँ

मैं सोग में हूँ मगर खड़ा हूँ; यह मिट्टी मैंने नहीं दी...

नहीं दी... तेरे ज़ुल्म को नहीं दी!

इन लोगों के रुके हुए रुदन से डर — वह तुझे यहीं हिला देगा

इस सारी सियाही से शर्म कर, इन गंदे हाथों से शर्म कर

उस लाला के ख़ून की क़सम — वह कभी... कभी बेकार नहीं गया!

आख़िर जाड़ा चला ही जाता है...

सियाही पंखुड़ी-पंखुड़ी बिखर जाती है...

और तेरे चेहरे पर बचती है...

सिर्फ़ शर्म... सिर्फ़ शर्म...

MIBL Radio
MIBL Nova
Melodies Inspired By Life
रेडियो पर बोलें
0:00 0:00
प्लेलिस्ट में जोड़ें