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मैं फिर रौशन होता हूँ — Mohsen Moussawi

मैं फिर रौशन होता हूँ

गीत

मैं फिर रौशन होता हूँ

Mohsen Moussawi

मैं फिर रौशन होता हूँ एल्बम से

MIBL Radio पर Mohsen Moussawi का “मैं फिर रौशन होता हूँ” सुनिए — मुफ़्त, बिना ऐप, तुरंत चालू।

टेम्पो
143 BPM
की
F minor 81% भरोसा
Camelot
4A

इसे 72 या 287 BPM भी पढ़ा जा सकता है — टेम्पो का दोगुना होना सामान्य है और दोनों सही हैं।

बोल

रात आई, और मेरा घर एक ही पल में बे-दीवार हो गया

हाथ मेरा ख़ाली, दिल ख़ामोश, और आँख धुँधली हो गई

मेरी गली में किसी ने एक शोला तक न जलाया

बरस मेरे कंधों पर बैठ गए, और यह तन बीमार हो गया

हर दरवाज़ा उन्होंने बंद किया, पर मैं नया रौशनदान बन जाता हूँ

जो कुछ मुझ पर बीता, अब मैं उसी खान का ख़ज़ाना बन जाता हूँ

रात जितनी गहरी होती गई, मैं उतना ही फिर रौशन हो जाता हूँ

पत्थर सहे, और सख़्त हुआ, यहाँ तक कि लोहा बन जाता हूँ

तेग़ मेरी जड़ पर चली, फिर भी यह तन जंगल हो गया

मैं जला, पर अपनी ही मिट्टी से हरी फ़सल बन जाता हूँ

राख के नीचे, फिर भी, मेरी एक जड़ जागती रही

मेरे आँसू हर रात उसके पाँव पर गिरे, तब जाकर वह जागी

सुबह हुई, और मेरे पुराने ज़ख़्म से एक फूल सिर उठा आया

जो अपनी ही राख में गिरा, वही ख़ुद गुलज़ार बन गया

हर दरवाज़ा उन्होंने बंद किया, पर मैं नया रौशनदान बन जाता हूँ

जो कुछ मुझ पर बीता, अब मैं उसी खान का ख़ज़ाना बन जाता हूँ

रात जितनी गहरी होती गई, मैं उतना ही फिर रौशन हो जाता हूँ

पत्थर सहे, और सख़्त हुआ, यहाँ तक कि लोहा बन जाता हूँ

तेग़ मेरी जड़ पर चली, फिर भी यह तन जंगल हो गया

मैं जला, पर अपनी ही मिट्टी से हरी फ़सल बन जाता हूँ

रात जितनी गहरी होती गई, मैं उतना ही फिर रौशन हो जाता हूँ

पत्थर सहे, और सख़्त हुआ, यहाँ तक कि लोहा बन जाता हूँ

तेग़ मेरी जड़ पर चली, फिर भी यह तन जंगल हो गया

मैं जला, पर अपनी ही मिट्टी से हरी फ़सल बन जाता हूँ

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