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बेरुख़ी — Mohsen Moussawi

बेरुख़ी

गीत

बेरुख़ी

Mohsen Moussawi

बेरुख़ी एल्बम से

MIBL Radio पर Mohsen Moussawi का “बेरुख़ी” सुनिए — मुफ़्त, बिना ऐप, तुरंत चालू।

टेम्पो
108 BPM
की
A minor 81% भरोसा
Camelot
8A

इसे 54 या 216 BPM भी पढ़ा जा सकता है — टेम्पो का दोगुना होना सामान्य है और दोनों सही हैं।

बोल

बरसों इस घर में मैं अजनबी रहा, कोई निशान न छोड़ा,

न एक बोसा, न एक गर्म हाथ, न एक अच्छा लफ़्ज़ सुना।

मेरी आँखें उस राह पर टिकी जिस पर मेहरबानी का निशान नहीं,

मेरा दिल एक सूखा रेगिस्तान, जिस पर मुहब्बत की बारिश नहीं।

न कोई आग़ोश जो जान को पनाह दे, न आँसुओं के लिए कोई कंधा,

न एक “मैं तुमसे प्यार करता हूँ” जो कीने की धूल धो दे।

बेपरवाही की आवाज़ हर लम्हा हवा में लिपटती रही,

और इस भारी ख़ामोशी ने थकी उम्मीद को पूरा निगल लिया।

कितनी सर्द है यह हवा, एक घर की बे-मुहब्बत हवा,

एक दिल जो मेहर माँगता है, कितना बेकस और कितना बेगाना।

एक नवाज़िश की तमन्ना, बस एक पर के छू जाने भर की,

बरसों बे-एहसासी, बदन पर कैसा ज़ख़्म छोड़ गई?

शायद, इस दीवार के पीछे कोई दिल छिपा बैठा हो,

जिसकी ज़बान एक लफ़्ज़ कहने से गिरह खा गई हो।

मगर एहसास के इस क़हत ने मेरे दिल के साथ क्या किया?

बरसों की बे-इश्क़ी मेरे सर पर क्या ले आई?

फिर भी मैं, इसी रेगिस्तान में, अब भी उम्मीद बोता हूँ

कि शायद किसी दिन यह ख़ामोशी मेरे यार के हाथों टूटे।

कि वह मेहर का एक लफ़्ज़ कहे, एक गर्म आग़ोश बख़्श दे,

और इतने बरसों बाद, शायद मैं ग़म से छूट जाऊँ।

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